पढ़ाई का मंत्र

ahlawat

आजकल आपने बहुत सारी कहानी सुनी होगी। लेकिन आज हमे आपके सामने एक पढ़ाई के संबंधित कहानी लाये है। वेदप्रकाश जी के घर में उदासी छाई हुई थी । बात थी ही ऐसी । राहुल का कक्षा का परीक्षा-फल घोषित हो गया था और वह फेल हो गया था। उसे विषयों में बहुत ही कम अंक मिले थे। वेदप्रकाश जी को अपने इकलौते के राहुल से बहुत आशाएँ थीं वे राहुल को एक तरह से मेहनती लड़का मानते थे। राहुल को मौहल्ले के अन्य आवारा लड़कों की तरह रोज ही फिल्म देखने और फालतू में गप्पें लड़ाने की कतई आदत नहीं थी। उसका एक ही काम था 12 घंटों पढ़ना । ऐसे राहुल का फेल हो जाना घर वालों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। वेदप्रकाश जी बहुत चिंतित थे। राहुल बहुत उदास और चुप रहने लगा था। उसने घर से निकलना बिल्कुल बंद कर दिया था। वेदप्रकाश सोच में पढ़ गये।

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राहुल के कक्षा अध्यापक से मिल चुके थे। वे राहुल के इतनी मेहनत करने के बाद भी परीक्षा में असफल हो जाने का कारण खोजने में लगे थे। उस दिन राहुल पढ़ाई कर रहा था। समीप ही अखबार पढ़ रहे वेदप्रकाश जी ने बहुत दबी जबान में अपनी पत्नी से कहा- “आज मेरे एक मित्र दोपहर दो बजे वाली गाड़ी से आ रहे हैं। मुझे उनको स्टेशन लेने जाना है। तुम याद दिला देना। "दो बजे वेदप्रकाश बेफिक्र होकर एक पत्रिका के पन्ने पलट रहे थे तभी राहुल तेजी से दौड़ता हुआ उनके पास आया और बोला, “पिताजी, आप स्टेशन नहीं गए? आज आपके मित्र आ रहे हैं।" "तुम्हें कैसे मालूम ?" "आप ही ने सुबह माँ से याद दिलाने को कहा था।" वेदप्रकाश जी के होठों पर रहस्यमयी मुस्कान रेंगने लगी, "बेटा, उस समय तो तुम पढ़ रहे थे। मैंने स्टेशन वाली बात बहुत ही धीमी आवाज में तुम्हारी माँ से कही थी, फिर भी तुमने सुन ली । इससे एक बात बिल्कुल साफ हो गई है । जानते हो क्या ? " "नहीं, पिताजी ?

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