इस कहानी में, व्यक्ति के चरित्र का ऐसा गुण है।

ahlawat

किसी गाँव में एक किसान रहता था। वह भला, सच्चा और नेक इंसान था। हमेशा दूसरों की मदद करने को तैयार रहता था। उसके चार बेटे थे। घर में अच्छी खेती थी। वह गाय और भैंस भी रखते थे। परिवार में सभी लोग मिल-जुलकर आनंद से रहते थे।

धीरे-धीरे वह किसान बूढ़ा हो गया। उसके बेटे लायक और समझदार थे। उन्होंने पिता के कार्य को अच्छी तरह सॅभाल लिया। बेटों ने पिता से कहा, पिता जी¡ अब आप घर में आराम करे। ईश्वर का नाम ले। हम कारोबार सॅभाल लेंगे। किसान ने भी बेटों की बात मान ली। अपने बेटों पर उसे पूरा विश्वास था। काम-काज उनको सौंपकर पिता निश्चिन्त हो गया।

गॉव वाले किसान का बहुत आदर करते थे। सब उनको दादा कहते थे। धीर-धीरे कुछ दिन बीत गए। आम का मौसम आ गया। यह क्या ? दादा को देखो? जो कभी यहॉ, कभी वहॉ, सारे गॉव में चक्कर लगा रहे थे। जहॉ कहीं भी उन्हे आम की गुठलियॉ पड़ी मिलतीं उन्हें उठाकर गॉव के बाहर जाकर जमीन में गाड़ देते थे।

उनके बेटों ने जब यह देखा तो उन्हे अच्छा न लगा। वे सोचने लगे, उनके बूढ़े बाप को क्या हो गया? लोग आज खा-खाकर गुठलियॉ फेंक देते है। और ये उस जूठन को साफ करते है।

कुछ बड़े लोग भी दादा जी को ऐसा करते देखकर हॅसते और कहते, बूढे़ की अक्ल सठिया गई है, जब देखो तबकूड़ा इकट्ठा किया करता है। लेकिन कोई कुछ भी कहे, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था।

आम को मौसम बीत गया, तब बेटों ने चैन की सॉस ली। उन्होंने सोचा, जब गुठलियॉ ही नही मिलेंगी तो पिता जी क्या करेंगे ? लेकिन यहा क्या वे कहॉ रुकने वाले थे? वे यहॉ वहॉ चक्कर लगाते रहते, जहॉ-जहॉ उन्होंने गुठलियां गाड़ी थी। कभी घर से कुछ कूड़ा करकट ले जाकर वहॉ डाल आते, कभी पानी ले जाकर डालते। सब लोग यही कहते, दादा जी सचमुच पागल हो गए है।

आम का अगला मौसम आया। दादा जी पुन: उत्साह से अपने काम में जुट गए। बेटों का पारा चढ़ गया। गॉववालों ने मज़ाक उड़ाया लेकिन उनके कान पर जॅू तक न रेगी। मौस बीतते-बीतते एक दिन दादा जी अचानक बीमार पड़े और दो-चार दिन में ही चल बसे। समय के साथ सभी लोग दादा जी को धीरे-धीरे भूलने लगे परंतु कुछ साल बाद लोगों ने देखा कि व उनकी भलाई के लिए ऐसा काम कर गए थे, जिसके बारे में लोग कभी सेच भी नहीं सकते थे। गॉव के चारों ओर आम के पेड़ लहलहा रहे थे। जिसे लोग दादा जी की सनक समझ रहे थे, वह वास्तव में उनकी सूझ थी। आम के मौसम में जब पेड़ो पर फल लगते तो गॉववाले दादा जी की जरुर यार करते थे। दादा जी की तरह हमे भी जीवन में अच्छे कार्य करने चाहिए।

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